पूर्ण एकांतवास में जाएंगे संत प्रेमानंद महाराज,अब नहीं बनाएंगे नए शिष्य
मुख्य बिंदु:
संत प्रेमानंद महाराज जी ने स्वास्थ्य कारणों और आध्यात्मिक साधना के लिए पूर्ण एकांतवास में जाने की घोषणा की है। उन्होंने कहा कि अब वे किसी को दीक्षा नहीं देंगे और न ही नए शिष्य बनाएंगे। महाराज जी ने बताया कि शिष्यों के कर्मों का प्रभाव गुरु पर भी पड़ता है, इसलिए यह निर्णय लिया गया है। गिरते स्वास्थ्य और नियमित डायलिसिस का जिक्र करते हुए उन्होंने जीवन के शेष समय को प्रभु भजन और एकांत साधना में समर्पित करने की बात कही। साथ ही भक्तों से निरंतर नाम-जप, सदाचार और राधारानी के प्रति अनन्य भक्ति बनाए रखने की अपील की।
मथुरा/वृंदावन।वृंदावन के प्रख्यात संत प्रेमानंद महाराज जी ने अपने भक्तों को एक भावुक संदेश देते हुए पूर्ण एकांतवास में जाने की घोषणा की है। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य और मानसिक शांति को बनाए रखने तथा जीवन के अंतिम पड़ाव में प्रभु चिंतन में लीन रहने के लिए यह निर्णय लिया गया है। महाराज जी ने भक्तों से चिंता न करने और इसे सभी के मंगल एवं कल्याण के लिए उठाया गया कदम बताया।
नए शिष्य बनाने पर लगाई पूर्ण रोक
संत प्रेमानंद महाराज ने अपने संदेश में एक बड़ा ऐलान करते हुए कहा कि अब वे किसी को दीक्षा नहीं देंगे और न ही नए शिष्य बनाएंगे। उन्होंने इसके पीछे का कारण बताते हुए कहा कि शिष्य बनाने से गुरु का तप नष्ट होता है और शिष्यों के पापों का प्रभाव भी गुरु को भुगतना पड़ता है।
उन्होंने कहा कि वर्तमान में बड़ी संख्या में लोग शिष्य बन रहे हैं, लेकिन भजन और सदाचार के मार्ग पर चलने वाले बहुत कम हैं। ऐसे में अब जितने शिष्य बन चुके हैं, उनके ही कल्याण में जीवन समर्पित करना उचित होगा।
अब नहीं होंगे प्रवचन, उपलब्ध हैं हजारों सत्संग
महाराज जी ने स्पष्ट किया कि अब वे किसी प्रकार के प्रपंच में नहीं पड़ेंगे और न ही नियमित प्रवचन करेंगे। उन्होंने बताया कि भक्तों के मार्गदर्शन के लिए पहले से ही 10 से 15 हजार प्रश्नों के उत्तर और सत्संग के वीडियो उपलब्ध हैं, जो आध्यात्मिक उन्नति के लिए पर्याप्त हैं।
‘राधारानी’ से अपनापन ही सबसे बड़ी साधना
भक्तों को साधना का मूल मंत्र देते हुए महाराज जी ने कहा कि श्री राधारानी के प्रति अनन्य प्रेम और अपनापन ही सर्वोच्च साधना है। उन्होंने निरंतर नाम-जप, भजन और सांसारिक मोह-माया से दूरी बनाए रखने की प्रेरणा दी।
उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति भजन नहीं करेगा, वह संसार के राग-द्वेष, ईर्ष्या और प्रपंचों में उलझकर दुखी रहेगा। इसलिए हर समय यह भाव रखना चाहिए कि “मैं श्रीजी का हूं और श्रीजी मेरी हैं।”
स्वास्थ्य को लेकर व्यक्त की चिंता
अपने गिरते स्वास्थ्य का उल्लेख करते हुए महाराज जी भावुक हो गए। उन्होंने बताया कि उनका प्रतिदिन डायलिसिस हो रहा है और शरीर लगातार कमजोर होता जा रहा है। स्थिति यह है कि चलने के लिए भी दो लोगों का सहारा लेना पड़ता है।
उन्होंने कहा कि बचपन में घर छोड़कर पूरा जीवन भजन और साधना को समर्पित किया। अब जीवन के अंतिम चरण में वे चाहते हैं कि कोई भी सांसारिक प्रलोभन उनकी बुद्धि को प्रभु से दूर न कर सके, इसलिए वे पूर्ण एकांत में रहकर अपना शेष समय ईश्वर चिंतन में बिताना चाहते हैं।
आश्रम की व्यवस्थाएं पूर्ववत रहेंगी
महाराज जी ने भक्तों की आशंकाओं को दूर करते हुए कहा कि आश्रम और दर्शन की सभी व्यवस्थाएं श्री राधारानी की कृपा से संचालित हो रही हैं। किसी व्यक्ति विशेष पर इन व्यवस्थाओं की निर्भरता नहीं है, इसलिए भविष्य में भी किसी प्रकार की परेशानी नहीं होगी।
भक्तों से किया सहयोग का आह्वान
संदेश के अंत में संत प्रेमानंद महाराज जी ने भक्तों से भजन, साधना और सदाचार में दृढ़ रहने की अपील की। उन्होंने कहा कि उनका मूल स्वभाव गंगा तट पर रहने वाले एक सरल और विरक्त संत का रहा है तथा अब वे पुनः उसी भाव में लौट रहे हैं। उन्होंने कहा कि यदि भक्त सच्चे मन से भजन करेंगे और धर्ममय आचरण अपनाएंगे, तभी उन्हें वास्तविक आनंद और संतोष की प्राप्ति होगी।