भोजशाला फैसले के बाद मथुरा-काशी विवाद को मिली नई धार, श्रीकृष्ण जन्मभूमि को ‘अतिक्रमण मुक्त’ करने की उठी मांग।
मुख्य बिंदु:
इंदौर हाई कोर्ट के भोजशाला मामले में आए फैसले के बाद मथुरा और काशी विवादों को नई धार मिल गई है। श्रीकृष्ण जन्मभूमि मामले के याचिकाकर्ता दिनेश शर्मा फलाहारी ने कहा कि भोजशाला फैसले और एएसआई रिपोर्ट को आधार बनाकर इलाहाबाद हाई कोर्ट में जन्मभूमि को अतिक्रमण मुक्त कराने की मांग की जाएगी। हिंदू पक्ष ने प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट 1991 को लेकर भी नए तर्क तैयार किए हैं।
मथुरा।इंदौर की ऐतिहासिक भोजशाला को लेकर हाई कोर्ट के हालिया फैसले के बाद उत्तर प्रदेश के मथुरा और काशी से जुड़े धार्मिक विवादों में नई हलचल तेज हो गई है। एएसआई (ASI) की रिपोर्ट और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आए इस निर्णय का हिंदू संगठनों और पक्षकारों ने स्वागत किया है। मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि मामले से जुड़े हिंदू पक्षकारों ने अब जन्मभूमि को “अतिक्रमण मुक्त” कराने की मांग और तेज कर दी है।
श्रीकृष्ण जन्मभूमि मामले में नई रणनीति की तैयारी।
श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह विवाद मामले के याचिकाकर्ता दिनेश शर्मा फलाहारी ने कहा है कि भोजशाला मामले में आए फैसले को आधार बनाकर वह इलाहाबाद हाई कोर्ट में श्रीकृष्ण जन्मभूमि को अतिक्रमण मुक्त कराने की मांग करेंगे। उनका कहना है कि न्यायालय ने भोजशाला प्रकरण में एएसआई रिपोर्ट और ऐतिहासिक साक्ष्यों को प्राथमिकता दी, जिससे मथुरा और काशी मामलों में भी हिंदू पक्ष की उम्मीदें बढ़ी हैं।
“अवैध कब्जों के खिलाफ उठी आवाज”
दिनेश शर्मा फलाहारी ने इंदौर हाई कोर्ट के फैसले को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि मुगलकाल में कई प्राचीन धार्मिक स्थलों पर कब्जे किए गए थे। अब न्यायालयों के ऐसे फैसलों से हिंदू समाज में न्याय मिलने की उम्मीद मजबूत हुई है। उन्होंने कहा कि न्यायालय ने सभी पक्षों को सुनने और एएसआई की रिपोर्ट का अध्ययन करने के बाद निर्णय दिया, जो ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित है।
प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट 1991 पर फिर छिड़ी बहस।
मथुरा के हिंदू पक्षकारों का कहना है कि इंदौर हाई कोर्ट ने अपने फैसले में पूजा उपासना अधिनियम (Places of Worship Act), 1991 को इस मामले में प्रभावी नहीं माना। इसी आधार पर अब प्रयागराज हाई कोर्ट में भी नए तर्क रखने की तैयारी की जा रही है।
हिंदू पक्ष का दावा है कि मथुरा और काशी से जुड़े विवादित स्थल “अतिक्रमण की भूमि” हैं, इसलिए उन पर 1991 का कानून लागू नहीं होना चाहिए। साथ ही यह भी कहा गया कि श्रीकृष्ण जन्मभूमि विवाद 1947 से पहले से अदालतों में लंबित रहा है, जिससे यह मामला प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट के दायरे से बाहर माना जाना चाहिए।
मथुरा और काशी मामलों पर बढ़ी कानूनी गतिविधियां।
भोजशाला फैसले के बाद मथुरा और काशी से जुड़े मामलों में कानूनी गतिविधियां तेज होने के संकेत मिल रहे हैं। हिंदू पक्षकार इसे अपने दावों को मजबूत करने वाला निर्णय मान रहे हैं, जबकि इस मुद्दे पर आगे न्यायालयों में विस्तृत बहस होने की संभावना जताई जा रही है।