“आस्था का सैलाब, व्यवस्था बेहाल: गोवर्धन में मौत को मात देकर सफर कर रहे श्रद्धालु”
मुख्य बिंदु:
पुरुषोत्तम मास और पूर्णिमा पर्व पर गोवर्धन में उमड़ी लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ के बीच परिवहन और सुरक्षा व्यवस्थाओं की पोल खुल गई। बसों की छतों व ओवरलोड वाहनों में जान जोखिम में डालकर सफर कर रहे श्रद्धालुओं के बावजूद प्रशासन और परिवहन विभाग प्रभावी कार्रवाई करता नजर नहीं आया, जिससे किसी बड़े हादसे की आशंका बनी हुई है।
मथुरा। पुरुषोत्तम मास और पूर्णिमा पर्व पर गिरिराज महाराज की परिक्रमा के लिए गोवर्धन में लाखों श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा है। श्रद्धालुओं की भारी भीड़ के बीच जिला प्रशासन, पुलिस और परिवहन विभाग के सुरक्षा एवं यातायात प्रबंधन के दावे धरातल पर दम तोड़ते दिखाई दे रहे हैं। श्रद्धालुओं की सुरक्षा भगवान भरोसे नजर आ रही है।
वाहनो के छतों पर बैठकर सफर करने को मजबूर श्रद्धालु
गोवर्धन आने-जाने वाले मार्गों पर परिवहन व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है। बसों और टेंपो में क्षमता से कई गुना अधिक यात्रियों को बैठाया जा रहा है। हालात इतने खराब हैं कि बड़ी संख्या में श्रद्धालु बसों की छतों पर बैठकर यात्रा कर रहे हैं। कई वाहनों में लोग दरवाजों और पीछे लटककर सफर करते दिखाई दिए। इसके बावजूद जिम्मेदार विभाग कार्रवाई करने के बजाय तमाशबीन बने हुए हैं।
अतिरिक्त संसाधनों के दावे साबित हुए खोखले
भीड़ को देखते हुए प्रशासन और रेलवे की ओर से अतिरिक्त बसें, ट्रेनें और सुरक्षा व्यवस्था किए जाने के दावे किए गए थे, लेकिन जमीनी हकीकत इसके विपरीत दिखाई दी। प्रमुख मार्गों, बस स्टैंडों और रेलवे स्टेशनों पर श्रद्धालुओं को घंटों इंतजार करना पड़ा। अव्यवस्था के कारण लोगों को जोखिम भरे साधनों से यात्रा करने के लिए मजबूर होना पड़ा।
हादसे का बना हुआ है खतरा
बसों की छतों पर बैठे यात्रियों और ओवरलोड वाहनों की तस्वीरें किसी बड़े हादसे की आशंका को बढ़ा रही हैं। यदि अचानक ब्रेक लग जाए या वाहन अनियंत्रित हो जाए तो बड़ी जनहानि हो सकती है। इसके बावजूद परिवहन विभाग की ओर से न तो विशेष जांच अभियान चलाया गया और न ही नियमों का उल्लंघन करने वाले वाहनों पर प्रभावी कार्रवाई की गई।
जिम्मेदारों की चुप्पी पर उठ रहे सवाल
हर बड़े धार्मिक आयोजन से पहले सुरक्षा और बेहतर व्यवस्थाओं के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन गोवर्धन मेले के मौजूदा हालात उन दावों की पोल खोल रहे हैं। श्रद्धालुओं की जान जोखिम में होने के बावजूद जिम्मेदार अधिकारियों की चुप्पी सवाल खड़े कर रही है। यदि समय रहते व्यवस्थाओं में सुधार नहीं किया गया तो आस्था का यह महापर्व किसी बड़े हादसे में तब्दील हो सकता है।