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“बांके बिहारी मंदिर लाइव-स्ट्रीमिंग विवाद पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, हाई पावर्ड कमेटी को नोटिस”

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18 मई 2026, 07:52 PM
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“बांके बिहारी मंदिर लाइव-स्ट्रीमिंग विवाद पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, हाई पावर्ड कमेटी को नोटिस”
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Vigul News

वृंदावन। उच्चतम न्यायालय ने ठाकुर बांके बिहारी मंदिर की लाइव-स्ट्रीमिंग व्यवस्था से जुड़े कॉन्ट्रैक्ट विवाद में हस्तक्षेप करते हुए हाई पावर्ड मैनेजमेंट कमेटी को नोटिस जारी किया है। अदालत ने आरोपों को गंभीर मानते हुए एक सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।

सोमवार को W.P.(C) No. 1228/2025 में दाखिल अंतरिम आवेदन (IA No. 6809/2026) पर सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने मामले की प्रकृति पर चिंता जताई और राज्य पक्ष से स्पष्टीकरण तलब किया।

याचिकाकर्ता पक्ष की ओर से अधिवक्ता नरेंद्र कुमार गोस्वामी ने दलील दी कि मंदिर की लाइव-स्ट्रीमिंग का ठेका ऐसी संस्था को सौंपा गया, जिसने न तो औपचारिक टेंडर प्रक्रिया में हिस्सा लिया और न ही किसी अधिकृत बैठक में भागीदारी की। इसे “बैकडोर और पैराशूट एंट्री” बताते हुए उन्होंने पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल खड़े किए। यह भी सामने आया कि आवेदक द्वारा दायर आपत्तियों, शिकायतों और आरटीआई आवेदनों पर कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया गया। इस स्थिति को न्यायालय-निगरानी में कार्यरत कमेटी की जवाबदेही के लिहाज से गंभीर माना गया। अदालत ने प्रारंभिक टिप्पणी में कहा कि आरोपों की प्रकृति अत्यंत गंभीर है और संबंधित पक्षों से शपथपत्र के माध्यम से स्पष्ट जवाब अपेक्षित है।


लोक कल्याण मीडिया के निदेशक राजा तिवारी एडवोकेट ने दावा किया कि यह विवाद केवल प्रक्रिया संबंधी नहीं, बल्कि कथित वित्तीय अनियमितताओं से भी जुड़ा हुआ है। उनके अनुसार, उनकी संस्था ने विधिवत रूप से टेंडर प्रक्रिया में भाग लिया था और लाइव-स्ट्रीमिंग का तकनीकी खाका प्रशासन को सौंपा था। राजा तिवारी का कहना है कि उनके प्रस्ताव और तकनीकी मॉडल को दरकिनार कर पूर्व नियोजित तरीके से कॉन्ट्रैक्ट किसी अन्य संस्था को आवंटित किया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि निर्णय प्रक्रिया में तकनीकी पहलुओं की अनदेखी हुई और संभावित मिलीभगत के चलते निष्पक्षता प्रभावित हुई। साथ ही, यह भी आरोप लगाए कि कमेटी की बैठकों में सभी सदस्यों को अपनी बात रखने का अवसर नहीं दिया जाता और चारों सेवायत सदस्यों की भूमिका भी संदिग्ध रहती है। संबंधित कंपनी और कमेटी नेतृत्व के बीच पूर्व परिचय की बात भी सामने आई है, जिससे पूरे प्रकरण की निष्पक्षता पर प्रश्न और गहरा गया है। अब यह मामला केवल एक ठेका विवाद तक सीमित नहीं रहा। अदालत के समक्ष प्रमुख सवाल यह है कि न्यायिक निगरानी में गठित कोई संस्था क्या बिना पारदर्शी प्रक्रिया के सार्वजनिक महत्व के कॉन्ट्रैक्ट दे सकती है। क्या आपत्तियों और शिकायतों की अनदेखी न्यायिक सिद्धांतों के विपरीत है और क्या इसमें वित्तीय अनियमितता या मिलीभगत के संकेत मौजूद हैं। मामले की अगली सुनवाई अगले सप्ताह संभावित है, जहां अदालत विस्तृत जवाब और रिकॉर्ड के आधार पर आगे की दिशा तय करेगी।